सबद-94
ओ३म् सहंस्र नाम सांईभल शिंभु । म्हे उपना आदि मुरारी ।। जद मैं रहयो निरालंभ होकर । उतपति धंधुकारी।। ना मेरै मायन ना मेरै बापन । मैं अपनी काया आप संवारी ।। जुग छतीसों शून्यहि बरत्या । सतजुग माहीं सिरजी सारी ।। ब्रह्मा इन्द्र सकल जग थरष्या । दीन्ही करामात केतीवारी ।। चन्द सूर दोय साक्षी थरप्या । पवन पवनेश्वर पवन अधारी ।। तदम्हे रूप कीयो मैनावतीयो । सत्यव्रत को ज्ञान उचारी । तदम्हे रूप रच्यो कामठीयो । तेतीसों की कोड़ हंकारी ।। जब मैं रूप धरयो वाराहीं । पृथिवी दाढ़ चढ़ाई सारी ।। नरसिंघ रूप धर हिरण्यकश्यप मार्यो । प्रहलादो रहियो शरण हमारी ।। बावन होय बलिराज चितायो । तीन पैंड कीवीं धरसारी ।। परशुराम होय क्षत्रियपन साध्यो । गर्भ न छूटी नारी ।। श्री राम शिर मुकुट बंधायो । सीता के अहंकारी ।। कन्हड़ होय कर बंसी बजाई गऊ चराई ।। धरती छेदी । काली नाथ्यो । असुर मार किया क्षयकारी ।। बुद्ध रूप गयासुर मार्यो । काफर मार किया बेगारी ।। पंथ चलायो राह दिखायो । नौवर विजय हुई हमारी । शेष जंभराय आप अपरंपर । अवल दिन से कहियो ।। जांभा गोरख गुरु अपारा ।। काजी मुल्ला पढ़िया पंडित । निंदा करै गिवारा ।। दोजख छोड़ भिस्त जे चाहो । तो कहिया करो हमारा ।। इन्द्रपुरी बैकुण्ठे बासो । तो पावो मोक्षहिं द्वारा ।।९४।।